00324fc9d7109e097332c96a541277f12be11469 cast certificate बनवाने के क्या महत्व हैं और क्यों बनवाना चाहिए। - GOVERNMENT SCHEME SCAM

जिन छोटे मोटे भ्रष्टाचार पर सरकार ध्यान नहीं दें पाती है उन्हें अब हम बताएँगे।

Breaking

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

cast certificate बनवाने के क्या महत्व हैं और क्यों बनवाना चाहिए।

   Jaati praman patra बनवाकर नौकरी या सरकारी योजनाओं का लाभ हर्जन या ओबीसी को मिल रहा है या फिर यह लाभ कुम्हार, काछी,गडरिया, धोबी,धानुक चमार आदि बनाकर दिया जा रहा है। पोस्ट को ध्यान से पढ़ें आपको कुछ ना कुछ मतलब जरुर समझ में आएगा।

  भारत में जातीय व्यवस्था होने की बजह से समाज में बहुत से दुष्परिणाम सामने आते ही रहते हैं। लोगों की अलग अलग जातियों की बजह से कई मुश्किलों का सामना आपके सामने भी हुआ होगा मुझे भी हुआ है और आगे आने वाले समय में होता ही रहेगा।

फोटो को देखकर कुछ गलत इरादा संबिधान की तरफ न समझें। संबिधान ने हर्जन का दर्जा जिन्हें दिया है उन्हें समानता का अधिकार भी दिया है लेकिन मनुस्मृति के हिसाब से हर्जन और ओबीसी को कुछ अधिकारों से वांछित रखा जाता था।

जातीय व्यवस्था को सीधे तौर पर खत्म करना भी गलत साबित होता है। जातीय व्यवस्था संबिधान न होने पर राज करने के लिए थी संबिधान लागू होने के बाद राजनीत में बहुत योगदान दे रही है।


         Cast certificate बनवाने के लिए संबिधान का फैसला है जिसे हम और आप बदल नहीं सकते हैं। Jaati praman patra पर कुछ लोगों के बीच जाकर एक राय ली। हालांकि मुझे अधिकार नहीं है किसी के बीच जाकर जो किसी भी संबिधान के फैसले पर या कोर्ट के फैसले पर लोगों के बीच राय लूँ। क्योंकि में कोई भी पत्रकार नहीं हूँ और न ही मेरी वैबसाइट न्यूज़ वेबसाइट है फिर भी लोगों से चर्चा की।

--------------------------------------------------------------------------

अन्य भ्रष्टाचार से संबंधित पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे दी हुयी पोस्ट पर क्लिक करें.

PM आवास योजना घोटाला में रिश्वत अधिकारी खा गए और रिकवर गरीब से किया जा रहा है। Click to Read

Panchayat Chunav से विकास की दर कई गुना बढ़ जाएगी बस एक वर्ष में दो बार होने लगें.Click To Read

Kisan Credit Card कैसे बनेगा? सीधी सी बात बिना दलाली नहीं बनेगा! Click To Read

---------------------------------------------------------------------------

       इस पोस्ट का बस इतना सा उद्देश्य है आरक्षण के हिसाब से अगर नौकरी या सरकारी लाभ आदि मिल रहे हैं तो 

  • जो हिस्सा ओबीसी के लिए है वह ओबीसी को ही मिल रहा है। फिर ओबीसी में कुम्हार, कहार, गडरिया, अहीर, पाल, कुशवाहा, आदि बनाने की क्या जरुरत है? वही कम सिर्फ ओबीसी के cast certificate से भी हो सकता है।
  • जो हिस्सा हर्जन के लिए है तो चमार, वाल्मीक, धोबी, धानुक, जाटव, आदि बनाने की क्या जरुरत है वही काम हर्जन के सिर्फ jaati praman patra से भी हो सकता है।
  • जो हिस्सा सामान्य वर्ग के लिए होता है वह उनको बिना jaati praman patra के ही मिल रहा है। उनको jaati praman patra की अवश्यकता क्यों नहीं होती है। फिर ओबीसी हर्जन आदि को जातियों में क्यों बांटा गया है।

        जातीय व्यवस्था भारत ही नहीं दुनियां के अधिकतम देशों में है लेकिन भारत में कुछ ज्यादा ही है। दुनियां के कई देशों में जातीय व्यवस्था होने के बाद भी लोगों के दिमाग में एक दूसरे के प्रति मतभेद नहीं है। भारत में जाति के हिसाब से लोगों को ऊँचा नीचा भी माना जाता है।

       भारत के संबिधान में भारत की कुछ मुख्य जातियाँ हैं जिनमें से मुख्य जनरल, ओबीसी, एस सी, एस टी, उसके बाद गोरखा, आदिवासी पहाड़ी भी हैं।

       भारत में जाती और उपजातियां उनके गोत्र आदि को जोड़ा जाये या आप याद करना चाहो तो बहुत मुश्किल है क्योंकि यह संख्या 2500 से अधिक है।

         हमने लोगों के बीच चर्चा इसलिए नहीं की इसलिए की जातीय व्यवस्था को किसी तरह से खतम किया जा सकता है या कभी नहीं किया जा सकता है जो चल रहा है ऐसा ही चलता रहेगा। जातीय व्यवस्था खतम होने के बाद लोगों के जीवन पर राजनीत का क्या असर होगा? संबिधान के मौलिक अधिकारों का क्या असर होगा यह सब बहुत बड़ी बात है। फिर आप इस आर्टिकल को ध्यान से पढ़ें आपको जरूर अच्छा लगेगा।


Jaati praman patra kaise banta hai?

भारत में जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए कुछ नियम हैं और यह नियम अलग अलग प्रदेशों में कुछ अलग अलग तरह के नियमों से बनाये जाते हैं। हालांकि पूरे भारत में जाति प्रमाण पत्र बनवाने के नियम सामान्य ही हैं थोड़ा बहुत अंतर है।

     कई प्रदेशों में विवाहित महिला का जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए थोड़ी मुस्किले हो जाती हैं। एक महिला की शादी अपने मूल क्षेत्र से अलग किसी अन्य क्षेत्र के पुरुष से होती है। और वह महिला अपना cast cirtificate बनवाना चाहती है तो उसे अपने पिता के पते पर अपनी जाती बनवानी होती है।

          महिला जिस गांव या क्षेत्र में पहले से रह रही थी वहां के ग्राम विकास अधिकारी, ग्राम प्रधान, लेखपाल, वार्ड अध्यक्ष, पार्षद आदि से लिखवाना होता है। उसके बाद वह महिला अपने पति के पते का jaati praman patra बनवा सकती है।


सरकारी नौकरी पाने के लिए jaati praman patra का महत्त्व।

       जब भी कोई सरकारी नौकरी निकलती है तो उसमें जातिगत आरक्षण के हिसाब से नौकरी दीं जाती हैं। माना की 100 लोगों को नौकरी देनी है जिसमें से 20 सामान्य वर्ग के लोग लिए जायेंगे, 30 ओबीसी से और 40 एस सी वर्ग से 10 अन्य कई वर्ग के लोग लिए जायेंगे।

    नौकरी पाने के लिए आप किस वर्ग से हैं उसका सत्यापन करने के लिए आपको अपना जाती प्रमाण पत्र बनवना होता है। उसमें भी सामान्य वर्ग के लोगों को जाती प्रमाण पत्र बनवाने की आवश्यकता नहीं होती है।

जातीय व्यवस्था से आज भी भारत बहुत कमजोर है।

  • प्रेम विवाह में अन्य जाती की महिला या पुरुष को सामाजिक दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है।
  • सामाजिक भोज इत्यादि में ऊंच जाती नींच जाती के हिसाब से भी लोगों के दिमाग में गहरा असर होता है।
  • नौकरी में किस व्यक्ति की जाती के हिसाब से ओकात तय की जाती है कि उसे क्या करना है खैर ये धीरे-धीरे खतम हो रहा है।

भारत में राज्य और क्षेत्र के हिसाब से कई जातियाँ हैं जो लगभग 2500 से अधिक हैं उन जातियों सभी जातियों में ऊंच नीच की भावना अभी भी है।

पुराने समय में जातीय व्यवस्था के कारण हर्जन और ओबीसी समाज की उपजातियों का शोषण हुआ शिक्षा से दूर रखा जाता रहा अच्छे रहन सहन से दूर रखा गया सम्मान आदि का भी कोई अधिकार नहीं दिया।

      बहुत ही पुराने समय में व्यवसाय के हिसाब से जातियाँ तय होती थीं फिर वह वंश के हिसाब से होने लगीं। जो मल मूत्र को उठाता था उसे चमार या वाल्मीक की जाती से परिभाषित किया गया। अगर एक चमार का लड़का है तो वह चमार ही होगा और उसका व्यवसाय भी उसके पिता वाला ही होगा। भले ही वह शारीरिक और मानसिक रूप से अच्छा हो।

  • अगर कोई ब्राम्हण है तो उसका बेटा अध्यापक ही बनेगा भले ही वह मानसिक कमजोर क्यों न हो।
  • कोई क्षत्रिय है तो उसका बेटा क्षत्रिय ही बनेगा। भले ही वह शारीरिक कमजोर क्यों न हो।
  • जिसका पिता मिट्टी के बर्तन बनाता था उसका बेटा भी वही करेगा।
  • जो भेड़ बकरियां चराता है उसका बेटा भी वही करेगा।

लेकिन अब समय के अनुसार थोड़ा बदलाव हुआ है संबिधान ने और उसके पहले से कुछ अंग्रेजों के कानून ने एक चमार के लड़के को भी जज बनने की हिम्मत और छूट दी।

  • नाई का काम कहार को करते देखा है सब्जी का काम क्षत्रिय को करते देखा है यह सब आपने भी देखा होगा।

      जातीय व्यवस्था हिन्दू धर्म के अनुसार अधिक बड़ी और प्रभाव शाली है अन्य धर्मों में इसका असर कम रहा है।

    कई लेखों के अनुसार यही साबित होता है। कि जातीय व्यवस्था से लोगों का शोषण किया गया। हम इस लेख से पुराने घाव को कुरेदना नहीं चाहते हैं जिससे आपके मन में अपने से बड़ी जातियों के लिए कोई गुस्सा आये बस जातीय व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास होना चाहिए।

      इस लेख से मेरा किसी पर निशाना जैसा कुछ नहीं है। बस लोगों के दिमाग में जो जातीय व्यवस्था की गलत थ्योरी गढ़ी है उसको हल्का करने का छोटा सा प्रयास है।

शहर हो या गांव हो ऊंच नीच सबमें में। आप भले ही शहर में रहते हैं और आपके साथ चमार बैठता है तो एक न एक बार आपके दिमाग में यह जरुर आया होगा कि यार चमार की कितनी ओकात हो गयी ऐसा क्यों है?

ग्रामीण क्षेत्र में जातीय व्यवस्था का असर अभी भी बरकरार है कई बार आपसी झगडे आज भी जातीय आधार पर हो जाते हैं इसे कैसे कम किया जाता है।

  जातीय व्यवस्था में ऊंच नीच मानने वाले कुछ तथ्यों पर हंसी आती है आप भी पढ़कर मुस्करा सकते हैं।

  • एक ऊँचे दर्जे का व्यक्ति अपने से नीचे दर्जे के व्यक्ति को अछूत मानता है। लेकिन उस अछूत की बेटी या बहू सुन्दर है उसके साथ लेटने में अछूत नहीं है।
  • ऊँचे दर्जे का व्यक्ति अपने से नीचे वाले के साथ भोजन नहीं करता है और न ही उसका छुआ हुआ खाता है लेकिन उसके हाँथ का दिया हुआ दान ले सकता है उसके घर का अनाज ले सकता है।
  • घर से मरे हुए व्यक्ति की अंतिम क्रिया में गयी हुयी सामिग्री में बचा हुआ समान अछूत होता है जिसे घर नहीं ला सकते हैं लेकिन उसी सामिग्री को ब्यापार करने वाले पुनः बाजार में बेच देते हैं जिसमें छूत नहीं होता है।

-

   अब समय बदलता जा रहा है और जातीय व्यवस्था धीरे धीरे छुआछूत आदि को कमजोर कर रही है लेकिन फिर भी कुछ बाते अभी भी ऐसी हैं जिनकी बजह से जातीय व्यवस्था को बढ़ावा मिल ही जाता है।

  • Cast certificate बनवाना
  • केवल एक ही जाती के संगठन बनाना।
  • केवल एक ही जाती के लोगों की सभाओं का आयोजन करना।
  • अपनी जाती को हमेशा सबसे ऊँची जाती का मानना।
  • अपनी जाती के इतहास को सर्वश्रेष्ठ मानना।
  • किसी भी पुराने समय के महापुरुष भगवान आदि को अपनी जाती और धर्म कुल आदि का मानना।

और भी कई ऐसी अवधारणा हैं जिनकी बजह से अभी भी जातीय व्यवस्था कमजोर नहीं है।

--------------------------------------------------------------------------

अन्य भ्रष्टाचार से संबंधित पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे दी हुयी पोस्ट पर क्लिक करें.

Anganvadi Kendra सरकार ने बंद नहीं किये तो क्यों बंद हैं।Click to Read

भारत में होने वाले चुनावों में शराब न बाटी जाये तो पता ही नहीं चलता है कि चुनाव हैं। Click To Read

भारत में अधिकतम चुनाव आयोग के हिसाब से नहीं गुंडई और पैसे से जीते जा रहे हैं। Click to Read

---------------------------------------------------------------------------

     भारत में जातीय व्यवस्था के नाम पर शोषण करना अभी 2022 में संबिधान लागू होने के कई वर्षों के बाद भी जारी है।  कोई आपको झूंठी कहानी नहीं बिल्कुल सच्चाई बता रहा हूँ।

     उत्तर प्रदेश के एक गांव जहाँ मेरे रिस्तेदार रहते हैं उस गांव का नाम नहीं लिख रहा हूँ लेकिन जरुरत पड़ी तो बता देंगे। उस गांव की कहानी पर ध्यान देते हैं जो एकदम सच है।

      ओबीसी समाज और जनरल समाज के व्यक्ति उस गांव में रहते हैं। वहां पर जनरल समाज के लोग ओबीसी को भी नीच ही मानते हैं। जब ओबीसी समाज के घरों में कोई भी अनुष्ठान होता है जिसके लिए उनकी अलग रिवाज़ है।

     ओबीसी समाज के लोग बाजार से खाने पीने की कच्ची सामिग्री अपने पैसे से खरीद कर लाते हैं। और कुछ सामिग्री घर में होती है वह भी शामिल की जाती है।

     जनरल समाज के लोग अपने खाने के लिए भोजन तैयार करते हैं। जबतक अपने लिए भोजन तैयार किया जाता है उतने समय तक ओबीसी समाज के व्यक्ति को इजाजत नहीं होती है जो आप भोजन बनाने वाली जगह तक भी जाएँ।

      जब जनरल समाज अपने लोगों के लिए भोजन तैयार कर लेता है और अपने घर ले जाता है वहां बैठ कर खाता भी नहीं है। उसके बाद ओबीसी समाज भोजन बनाने वाली जगह में घुसता है और अपने समाज के लिए भोजन तैयार करता है।

      ये कहानी आपको भले ही दिलचस्प न लगे लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही है जब ओबीसी समाज अपने घर से और बाजार से अपने पैसे से सामिग्री खरीद कर लाया तब वह वस्तु छूत नहीं थी बाद में उसी सामिग्री को छूना गुनाह है। साला समझ में नहीं आ रहा है सबसे बड़ा मूर्ख कौन है?


Cast certificate के हिसाब से भारत के समाज में अभी भी ऊंच नीच है। जिनकी कुछ कमजोरी और विशेषताएं हैं।


जिन जातियों को संबिधान के हिसाब से सामान्य में रखा गया है। इनकी विशेषता यह है कि

  • ये लोग एक साथ भोजन कर लेते हैं 
  • एक दूसरे का छुआ हुआ भोजन कर लेते हैं।
  • एक दूसरे के घर भोजन कर लेते हैं।
  • ब्राम्हण ठाकुर के घर खा लेता है ठाकुर बनिया के घर खा लेता है यानि सब समान ही है।

बस ब्राम्हण का एक विचार एक सोच जरुर है कच्चा भोजन और पक्का भोजन। आपके घर अगर खाने आता है तो पूड़ी ही खायेगा जो पक्का भोजन होता है और रोटी कच्चा भोजन होता है। फिर भी खा सकता है।

इनकी कमजोरी यह है। 

  • बेटी की सादी आदि हमेशा अपने से ऊँचे दर्जे के लड़के में करनी होती है। 
  • शादी में आपसी प्रेम हो या न हो शादी करनी होती है।


ओबीसी में जिन जातियों को रखा गया है उनकी विशेषता 

  • खान पान के लिए सही है एक दूसरे के घर
  • एक दूसरे के साथ खा सकते हैं।
  • कुम्हार पाल के घर खा लेता है पाल नाइ के घर खा लेगा कहार अहीर के घर खा लेगा सब आपस में छुआ छुत नहीं मानते हैं।
    ओबीसी और जनरल में एक विशेषता उभर कर आ रही है जो आने वाले समय में बहुत अच्छी होगी कि ये लोग भारत के अधिकतम क्षेत्रों में एक साथ बराबर में  बैठ कर भोजन करने लगे हैं ऊंच नीच का विचार थोड़ा सा कमजोर हुआ है।

इनकी कमजोरी यह है। 

  • बेटी और बेटे का विवाह अपनी ही बिरादरी में करना होता है। 
  • अगर कोई बेटी या बेटा अपना प्रेम विवाह किसी अन्य बिरादरी से कर लेता है तो सामाजिक अवहेलना का सामना करना होता है। लेकिन संबिधान में इसे दोष नहीं माना है।


हर्जन समाज के लिए जातीय व्यवस्था सबसे बड़ा अभिशाप है जो आजतक दूर नहीं हुआ है। 

जितनी जातियों को हर्जन में रखा गया है।

  • वो एक दूसरी बिरादरी को आपस में ही ऊँचा नीचा मानते हैं।
  • वाल्मीक चमार के हाथ का भोजन नहीं करता है चमार वाल्मीक के हाथ का भोजन नहीं करता है।
  • धोबी चमार के हाथ का नहीं खायेगा धानुक जाटव के हाथ का नहीं खायेगा।

     हर्जन का अभी भी कम नहीं हुआ है। हर्जन ओबीसी और सामान्य वर्ग के लोगों के बराबर बैठकर भोजन तो करना चाहता है लेकिन आपस में हर्जन वर्ग में आने वाले लोगों को ऊंच नीच मानता है।

     जबकि संबिधान के हिसाब से सभी हर्जन हैं फिर भी एक दूसरे को आपस में  ही ऊँचा नीचा मानते हैं। जबकि हर्जन हर्जन की सोच एक साथ भोजन के लिए ओबीसी और सामान्य वर्ग के लोगों के समान हो जाये तो बहुत ही अच्छा होगा।

विवाह सम्बन्ध हर्जनों में ओबीसी वर्ग के लोगों की तरह ही होता है।

भारत में क्षेत्र और प्रान्त के हिसाब से अपनी ही जाती को ऊँचा नीचा मानते हैं।

  • हरियाणा का प्रजापति पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुम्हार को अपने  बराबर का नहीं मानता है। उत्तर प्रदेश का कुम्हार गधेरे कुम्हार को अपने से छोटा मानता है। जबकि सभी ओबीसी में ही आते हैं।
  • उत्तर प्रदेश का पाल मध्य प्रदेश के गडरिया को बराबर का नहीं मानता है बघेल पाल को छोटा मानता है जबकि सभी ओबीसी में ही आते हैं।
  • चौबे तिवारी को छोटा मानता है तिवारी दुबे को छोटा मानता है। शुक्ला मिश्रा के बराबर का नहीं है त्रिपाठी के ठाट ही अलग हैं। जबकि यह सामान्य ही हैं।
  • सेंगर चौहान बराबर नहीं हैं भदौरिया नीचे हैं ठाकुर राजपूत बहुत ऊपर हैं आपस में बहुत ही घमंड है जिसकी कोई सीमा नहीं आपस में ही एक दूसरे को छोटा मान बैठे हैं जबकि संबिधान में बराबर हैं ।


     हम किस किस बिरादरी को कोस कर बतायें सभी में यही धारणा बह रही है। बस सोच यह है जो ये jaati praman patra बनाये जाते हैं इनमें जो ओबीसी में आता है उसे 

  • सिर्फ ओबीसी का cast certificate दिया जाये ना कि गडरिया कुम्हार नाइ कहार आदि का प्रमाण पत्र।
  • जो हर्जन है उसे सिर्फ हर्जन का जाती प्रमाण पत्र दिया जाये न कि चमार धोबी धानुक आदि का।

इससे जातीय व्यवस्था के असर को कम जरुर किया जा सकता है।














कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कुल पेज दृश्य

पेज