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Tuesday, August 31, 2021

यह सवाल कब शुरू होंगे . when will this question start ,

     यह सवाल कब शुरू होंगे - पत्रकार महोदय आपने कितने निर्दोष लोगों को दोसी बनाया है? पुलिस महोदय आपने कितने निर्दोष लोगों को सालखों के पीछे भेजा है?

     पत्रकार का काम क्या है? क्या पत्रकार और प्रशासन मिलकर काम करते हैं? समाज के लिए पत्रकार की भूमिका क्या होनी चाहिए? पत्रकार किसके चरित्र का दर्पण है?

पत्रकार का काम क्या है?
पत्रकार का काम क्या है?


      हम अपने कुछ लेखों में पत्रकार ( रिपोर्टर ) के चरित्र पर शक करते हैं। हो सकता है पत्रकार वैसा न हो जैसा हम लिखते हैं। पत्रकार ( रिपोर्टर ) दिनरात दूप धूल को न देखते हुए खबरों को इकठ्ठा करता है। जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुँचाता है। फिर भी हम उस मेहनती पत्रकार की आलोचना अपने यूट्यूब चैनल और पोस्ट में कर देते हैं मुझसे बुरा सायद ही कोई होगा। हम आपकी नजरों में भले बुरे जैसे भी हों क्या आप पत्रकार की आलोचना करने वाली वजह नहीं जानना चाहेंगे। सबसे पहले तो आपको आलोचना की वजह ही बता देते हैं।

      पत्रकार का काम क्या है?

      पत्रकार का काम है जमीन पर आम जनता के बीच क्या हो रहा है, लोकतंत्र सुरक्षित है अगर नहीं है तो उसकी वजह क्या है, साशन प्रसाशन लोगों के हित में कैसी भूमिका निभा रहा है, अगर गलत भूमिका निभा रहा है इन सभी पर काम करता है पत्रकार।हो क्या रहा है और बताया क्या जा रहा है उस बात की पड़ताल करना, कौन कितना निर्दोष है इस बात के भी सवाल करना। शासन-प्रशासन में मौजूद लोगों के बीच कितना झूंठ और सच फैलाया जा रहा है उस बात को उजागर करना पत्रकार का ही काम है। लेकिन नहीं पत्रकार शासन प्रशासन से सवाल नहीं करता है बल्कि जो लोग शासन-प्रशासन में बैठे हैं उन्हीं की सूचना के हिसाब से काम करता है।

      शासन जनता को 1 किलो गेहूं दे रहा है उस एक किलो गेहूं के साथ लाभार्थी की फोटो व देने वाले की फोटो लेकर पत्रकार उसी खबर को चला पाता है या ऐसे समझ लो उसी एक फोटो पर पूरे दिन चैनल पर काम करने का मौका मिल जाता है।न्यूज़ चैनल, अखवार के पास इस बात का टाइम नहीं है कि उस फोटो के आलावा जो कैमरे के फ्रेम में नहीं आये उनको भी 1 किलो ही मिला है या 250 ग्राम ही पहुंचा है। बाकी 750 ग्राम में किस - किस अधिकारी का हिस्सा था। राशन आपूर्ति विभाग में घोटाला करने के तरीके को जानने के लिए इस लिंक को खोलें।

     पत्रकार, शासन और प्रशासन को काम मिलकर ही करने चाहिए लेख का उद्देश्य यह नहीं है कि ये सभी एक दूसरे से बगावत कर लें। वल्कि काम किन मुद्दों पर नहीं हो रहा है उसे आलोचना के जरिये पत्रकार शासन प्रशासन तक पहुँचाता है। इसका उल्टा हो रहा है शासन प्रशासन ने जो कहानी पत्रकार को बता दी वही बात मान कर बिना पड़ताल किये चैनल अखावार में फैलाना शुरू कर दिया।


       आज कल 500 रुपये में जो पत्रकार का पहचान पत्र बनवा लेते हैं उनकी बात तो पूरी दुनियां से ही अलग है। 500 रुपये में पत्रकार कैसे बनते हैं इस लिंक पर क्लिक करें। जो पत्रकार लोकल की खबरों को टीवी तक पहुंचाने का काम करते हैं वह पुलिस प्रशासन की चमचागिरी के साथ क्षेत्र के नेताओं की चमचागिरी करने में लगे हैं। एक निर्दोष को पुलिस पकड़ कर जेल भेज देती है फिर पुलिस की सूचना पर वह लोकल का पत्रकार थाने पहुँचता है। उस पत्रकार को पुलिस के द्वारा बताया जाता है कि उन्होंने वाहन चोरी के आरोप में चार शातिर बदमाशों को गिरफ्तार किया है। पुलिस प्रशासन के अधिकारी भी वीडियो में आने के लिए बहुत ही लगनशील बनकर बैठ जाते हैं। पत्रकार भी सच मानकर पुलिस से बिना सवाल किये हुए इस खबर का टाइटल बना देता है फला पुलिस थाने को मिली बड़ी कामयाबी किया वाहन चोर गिरोह का भंडाफोड़।

ऐसा भी नहीं है इस तरह के टाइटल वाली सभी झूठी hi होती हैं। सच hi होती हैं एक आध खबर झूठी होती भी है उससे क्या फर्क पड़ता है। जब देश का साशन झूंठ बोल सकता है एक पत्रकार एक आध गलत खबर निकाल देगा छाप देगा उससे क्या बिगड़ जायेगा। यह खबर जब सीनियर अधिकारी सुनते हैं उनको भी लगता है फलां थाने का पुलिस प्रशासन बहुत अच्छा काम कर रहा है। ऐसा महसूस होता है किसी निर्दोष को जेल भेजने का कम्पटीशन चल रहा होता है। अगर एक महीने में किसी थाने से कम मामले आ रहे हैं तो ऐसा लगता है कि प्रशासन ढंग से काम नहीं करता है। अपराध और अपराधियों की गिनती बढ़ाने के लिए जो मर्जी आये बो करो अपने आपको ब्यस्त देखना है।  

      पत्रकार से लेकर सीनियर तक यह सवाल कोई नहीं करता है आपके द्वारा कितने लोग बेगुनाह फ़साये गये हैं। सायद यह पूछने की हिम्मत किसी अखवार टीवी चैनल और पत्रकार में नहीं है। जो वाहन चोरी की बात हमने लिखी है यह बिल्कुल सच है इसमें एक निर्दोष पढ़ने वाले क्षात्र को पुलिस ने वाहन चोरी के आरोप में जेल भेज दिया। इस खबर को हम विस्तार से नहीं लिख सकते क्योंकि हम रजिस्टर्ड पत्रकार नहीं हैं। और न ही मेरे पास लेखक होने का लाइसेंस हैं फिर भी कभी जरुरत पड़ी तो पुलिस के सामने इस बातको उजागर जरूर करूँगा। इस खबर को इस वजह से भी विस्तार से नहीं लिख सकता हूँ कि मुझे जो भी जानकारी मिली वो लड़के के पिता के द्वारा मिली।

       लड़के के पिता के अनुसार तो मुझे उसका लड़का निर्दोष ही लगा। इस बात की रिपोर्टिंग करने का अधिकार मुझे न होने की वजह से उस गाँव में लोगों के बीच जाकर पूँछताछ नहीं कर सकता हू। जबकि इस पूंछताछ का काम लोकल के पत्रकार होना चाहिए। ये मामला थाना अछल्दा का जनपद औरैया अक्टूबर 2020 का है। लड़के का पिता भले ही हमसे झूंठ बोल रहा हो अपने बेटे को निर्दोष साबित करने के लिए। फिर भी उसके पास मौजूद कुछ दस्तावेज जैसे बस का टिकट जिस दिन पिता पुत्र घर आये, जिस कम्पनी में ड्यूटी करते हैं वह ड्यूटी रिपोर्ट, पिता पुत्र अपने घर पुत्र का एडमिशन के लिए आये थे हो सकता है यह सब झूंठ हो। और अगर पिता पुत्र सही हैं भी पुलिस ने झूंठ फसाया है बाद में कोर्ट के द्वारा पुत्र निर्दोष साबित होकर घर आयेगा। 

     तो कैसे यकीन होगा पुलिस प्रशासन पर। सायद ऐसी वजहों से ही पुलिस की रिस्पेक्ट करने का मन नहीं होता है पूरी पोस्ट के लिए क्लिक करें। पत्रकार  लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ जिसपर लोकतंत्र की छत टिकी हुयी है कैसे भरोसा किया जायेगा कि इस स्तम्भ में दीमक नहीं लग चुका है। पुलिस ने जिस लड़के को दोसी पाया और जेल भेज दिया। अपराध की पहली जाँच पुलिस ही करती है कैसे करती है यह आप इस थोड़े से उदाहरण में समझ सकते हैं। आपके आस पास वाले घरों में या गाँव में या फिर गलियों में ऐसी घटनाएं जरुर हुयी होंगी जिसमें पुलिस के साथ साथ पत्रकार, न्यूज़ चैनल ने भी किसी को दोसी बनाने में बिल्कुल देर नहीं की होगी।

       दूसरी घटना भी थाना अछल्दा की ही है जिसमें मई 2012 की घटना है। एक व्यक्ति पर रेप के साथ लड़की को जिन्दा जलाने का आरोप लगा जबकि कोर्ट ने 3 वर्ष बाद उसे निर्दोष पाकर बापस जेल से घर भेजा। वो निर्दोष ही था सायद इसीलिए निर्दोष पाया गया। पुलिस प्रशासन का काम होता है, नियम होता है आपके खिलाफ कोई दूसरा व्यक्ति रिपोर्ट लिखवाता है आपने भले ही कोई अपराध न किया हो। जबतक आपसे पुलिस पूँछताछ नहीं कर लेती है तबतक आप निर्दोष या दोसी साबित नहीं हो सकते।

       प्रथम जाँच जो आपके थाने के द्वारा होने के बाद आप दोसी हैं या नहीं हैं उसके बाद मामला कोर्ट को जाता है। प्रथम जाँच में जिस पर रेप के साथ जलाकर हत्या का आरोप था पुलिस ने भी दोसी पाया। पुलिस ने दोसी पाया यह सायद इसलिए कि जिसकी बेटी मरी है उसकी भी सुननी है। अगर कोई कार्यवाही नहीं होती है तो पीड़िता का पिता जिला स्तर से अपनी शिकायत कर सकता है जिससे पुनः थाना प्रशासन पर कार्यवाही का प्रेशर आयेगा। इन सभी बातों को दोहराया न जाए इस वजह से जल्दी जाँच करके दोसी बनाकर जेल भेज दो सही गलत कोर्ट में होता रहेगा अपने सर से बोझ हट गया। इस घटना में मीडिया ने भी वही किया जो नहीं करना चाहिए। बिना किसी पुस्टि किये बिना किसी पूंछे हत्या करने का आरोपी बताकर टीवी व अखबार में ख़बरें निकाली गयीं। खबरें अगर सही निकलती हैं तो पुलिस का भी थोड़ा नजरिया बदलता है।

    जब दौनो मिलकर एक ही काम कर रहे हैं फिर तो सभी काम कोर्ट को ही करने चाहिए। पत्रकार और पुलिस प्रशासन की अहम भूमिका में हिस्सेदारी न के बराबर है।  रेप के साथ हत्या के आरोपी को जेल हुयी उसने 3 वर्ष जेल में गुजारे साथ में लाखों का खर्चा हुआ अपने आपको निर्दोष साबित करने के लिए। इस हिसाब से फिर तो आप किसी को जेल भी जेल करवा सकते हो बस मौका देखना है कब फसाया जा सकते है। जैसे ही मौका लगे सिर्फ थाने में सूचना देनी है बाकी का काम पुलिस और मीडिया संभाल लेगी।

       मेरी जानकारी में जब दो ऐसे मामले हैं और भी हैं जिक्र सिर्फ दो का किया आपके यहाँ भी होंगे। इस हिसाब से पूरे भारत में कितने मामले होंगे जिनकी सजा निर्दोष व्यक्ति काट रहे हैं।

        किसी क्षेत्र में घटित हुयी घटना पर अहम भूमिका लोकल के पत्रकार ( रिपोर्टर ) की होती है। जरुरी नहीं है किसी बड़े चैनल ने घटना को किस तरह दिखाया हो लेकिन सबसे अधिक जानकारी लोकल के पत्रकार को हो जाती है। लेकिन ऐसा क्या है जो लोकल का पत्रकार रिपोर्टर सच जानते हुए भी ऊपर तक नहीं भेजता, अगर भेजता भी है तो उसकी बात पर अमल क्यों नहीं होता है। न्यूज़ चैनल या अखवार के लिए खबरें लोकल का पत्रकार ( रिपोर्टर ) ही पहुँचाता है कभी कभार मौका पड़ने पर नामी पत्रकार रिपोर्टर आ जाते हैं। बो भी तब आते हैं खबर में जिस व्यक्ति का नाम जुडा है वह दलित है अल्पसंख्यक है या फिर छोटी सी बात को बड़ा मुद्दा बनाने का मौका तलाशना।  टीवी पर प्रत्येक घटना को दिखाया भी नहीं जा सकता है जिसकी मजबूरी यह है न्यूज़ चैनल के पास फालतू सो बनाने से फुरसत नहीं है। इतने अधिक अखवार बहुत से न्यूज़ चैनल के बाद भी सभी खबरें नहीं दिखाई जा सकती हैं।


क्या पत्रकार और पुलिस प्रशासन मिलकर काम करते हैं?

      ये सवाल आपका भी हो सकता है अगर आपका भी है तो आपके मन में बिल्कुल सही सवाल है। लोकल का पत्रकार और उसके थाने की पुलिस मिलकर ही काम करते हैं। दौनो को साथ काम करने की वजह भी बिल्कुल सरल है। पत्रकार पुलिस से सवाल इसलिए नहीं करता है किसी दिन मेरा या मेरे किसी का मामला फसा तो मुझे बख्स दिया जाएगा या थोड़ी बहुत रियायत दे दी जाएगी। पुलिस पत्रकार की हल्की फुल्की गलती इसलिए माफ करती रहती है अगर हमने पत्रकार को पकड़ लिया तो हमारी करतूतों पर खबरें शुरू हो जाएंगी। सीधी सी बात है तूँ मुझे माफ कर में तुझे करता हूँ फिर एक दुसरे से सवाल कौन करेगा।


       पत्रकार ( रिपोर्टर ) शासन प्रशासन से सवाल करने की हिम्मत भी करता है तो उसे दवा दिया जाता है या उसकी आवाज थोड़ी सी जगह में सिमट जाती है। पत्रकार सवाल करता भी है तो वह किसी पार्टी के पक्ष में सवाल करता है। अगर किसी पत्रकार ने शासन में बैठे व्यक्ति से सवाल किया है उसमें ज्यादातर सवाल ऐसे होते हैं जो किसी विपक्षी पार्टी के होने चाहिए। पत्रकारिता का हाल इतना खस्ता होते जा रहा है जो किसी न किसी पार्टी के चमचे होते जा रहे हैं। तो ऐसे में ज्यादातर पत्रकार रिपोर्टर किसी न किसी पार्टी के कार्यकर्ता या प्रवक्ता बनकर काम कर रहे हैं। आज केलिए बस इतना ही अगर लेख में कोई त्रुटि है कृपया कमेंट में लिख दें उसका सुधार किया जायेगा।

धन्यवाद

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