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Tuesday, July 27, 2021

Reporter Identity Card बनवाकर आप बेरोजगारी में भी अच्छा खासा पैसा कमा सकते हैं।

      Fake Reporter बनकर आप भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज तो नहीं उठा सकते हैं लेकिन पैसा कमा सकते हैं।


    आजकल पत्रकारों की भरमार है। आप घर से दो किमी दूरी पर भी जाएँ तो आपको कई पत्रकार और रिपोर्टर मिल जायँगे। अब सवाल आता है कि रास्ते में आपको जितने भी पत्रकार मिले उनमें से 

  • कितने रिपोर्टर थे।
  • कितने पत्रकार थे।
  • कितने fake रिपोर्टर थे?
  • कितने दलाल पत्रकार थे?

        यह समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। सबसे अधिक मुश्किल उस व्यक्ति के लिए है जो पत्रकार या रिपोर्टर के सवालों से डरता है। उसने पत्रकार या रिपोर्टर का id card देखा नहीं कि डरना सुरु।

         आप अगर फर्जी और दलाल पत्रकारों की पहचान करना चाहते हैं तो सबसे पहले आपके एरिया में जो भी रिपोर्टर बना घूम रहा है या पत्रकार बना घूम रहा है उसके बारे में जो भी कमजोरी है उसकी जानकारी अन्य लोगों से जुटाओ। कभी मौका लगे आप खुद उससे सवाल करो पता चल जायेगा फर्जी है असली।





       आज आपको बताएँगे की मीडिया और सासान प्रशासन के बीच का प्रेम सम्बन्ध से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ में दीमक लगा हुआ है जो लोकतंत्र का खून पी रहा है। पोस्ट को ध्यान से पूरा पढ़ें सायद आपको कुछ अच्छा जरूर लगेगा।

       पत्रकार, रिपोर्टर प्रशासन के बीच में मामले सेटल का काम करने में जुटे हैं। एक समय था जब प्रशासन के लोग शासन के लोग न्यूज़ रिपोर्टर के नाम सुनते ही चहरे उतर जाते थे। क्योंकि उन्हें डर था कि पता नहीं हमसे किस नाकामी का सवाल कर दिया जाये और कल के न्यूज़ में मेरी उसी नाकामी के बारे में लिख दिया जाये।

    आज टाइम बदल चुका है न्यूज़ रिपोर्टर और पत्रकार सुबह जागते हैं। अपनी सुबह क नित्य कर्म करने के बाद घर से निकलते हैं।

  • जो रिपोर्टर और पत्रकार जिस पार्टी के प्रचार में लगा है उसी कार्यालय में जाता है। वहां चाय आदि होती है। फिर उसके बाद तय होता है कि आज खबर क्या चलानी है और ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग क्या करनी है?
  • कुछ पत्रकार शासन के दरवाजे पर पहुंचते हैं और दरोगा जी के साथ चाय पीते हैं बाद में पूंछते हैं कोई खबर है? दरोगा जी खबर बता देते हैं।

  "आज रात को 1 किलो चरस के साथ इनामी बदमाश पकड़ा है" । रिपोर्टर भी झट से कैमरा निकालता है और अपराधी  दरोगा जी और अन्य जाँबाज सिपाहियों के साथ वीडियो बनाता है। न्यूज़ चैनल पर खबर चला भी दी जाती है।

     रिपोर्टर के मन में यह नहीं आता है कि जिस गांव से अपराधी को पकड़ा है वहां जाकर पता कर लें। क्या सच में चरस के साथ पकड़ा है। वह रिपोर्टर ऐसा नहीं कर सकता है क्योंकि अगर वह ऐसा करेगा तो पता चलेगा कि अपराधी चड्ढी बनियान में सो रहा था और उसी हालत में पुलिस उठा ले गयी। उस रिपोर्टर की इतनी हिम्मत नहीं है कि शासन का दोगला चरित्र सामने ला सके।

            कई मामलों में ऐसा पता चला है कि यदि पुलिस किसी ऐसे व्यक्ति को पकड़ती है जिसका कोई संगीन अपराध नहीं है या फिर कोई अपराध ही नहीं है! ऐसे लोगों को पुलिस से बचाने के लिए पत्रकार और रिपोर्टर बीच में पैसे की दलाली का काम करते हैं, बीच में मामला को सेटल करने का काम करते हैं। अगर दलाली ठीक ठाक न हुयी तो पत्रकार और रिपोर्टर मिलकर जो अपराध होता भी नहीं है ऐसे मामलों की खबर निकालते हैं।


एक फर्जी प्रेस वाले से सामना हुआ तो हमने उससे सवाल सुरु किये।

  • आपको महीने में कितनी तनख्वाह मिलती है?

          कुछ नहीं!

  • तो क्यों पत्रकार बने घूम रहे हो?

         अपने आपको बचाने के लिए और कमाने के लिए!

  • कमा कैसे रहे हो?

         जितने भी लोकल के इनलीगल काम चल रहे हैं उनसे 500 या 1000 रूपये प्रतिमाह।

  • कितना कमा लेते हो?

         15 से 20 हजार!

  • अपने आपको बचा किस्से रहे हो?

          पुलिस से अगर अपनी गाडी लेकर कहीं चला जाऊं जिसने भी प्रेस लिखा देखा वह टच भी नहीं करता।

उस पत्रकार ने कई बातें बताई सब इसी प्रकार से थीं। यहाँ सब सॉर्ट में मेंसन हैं।

          हाँ उसने एक बात और बताई कि 450 रूपये में पत्रकार का पहचान पत्र बनता है एक साल के लिए फिर साल बाद रिनेवल कराना होता है।

हद तो अब है यूट्यूब पर एक वीडियो मिला जो मात्र 40 रूपये में पत्रकार का पहचान पत्र बना रहा है यकीन न हो तो लिंक खोलकर वीडियो देख लो। click to Watch video

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        देश का आईना, देश की चाल, देश का लोकतंत्र चार स्तम्भ पर टिका है बो लोकतंत्र के चार स्तम्भ कौन से हैं? आप अगर जानते हैं तो अच्छी बात है। आप नहीं जानते हैं तो में बता देता हूँ

(1) न्यायपालिका (2) कार्यपालिका (3) विधायिका (4) मीडिया

          लोकतंत्र के तीन स्तम्भ जो भी करते हैं, जनहित की सूचना सरकार प्रशासन को देना, सरकार की सूचना लोगों तक पहुंचना लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का काम है जिसे हम मीडिया कहते हैं पत्रकार कहते हैं लोकतंत्र के चार स्तम्भ में से जब सभी स्तम्भ भ्रष्टाचार में लिपट जाएँ तो फिर लोकतंत्र बचा कहाँ है इन सभी स्तम्भ की जहाँ नींव पड़ी है वह ठीक है। जहाँ से शुरुआत होती है वह ठीक है । लेकिन बाहरी हिस्सों ने अपना काम ठीक से करना छोड़ दिया है । 


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       अक्सर मन में खयाल आता है लोकतंत्र के चार स्तम्भ में से कौन सा स्तम्भ खतरे में है? यह सवाल कथित बुद्धिजीवी भी पूछने की कोसिस करते हैं ये सवाल अगर आपके दिमाग में भी है - सायद आप कहीं गलत तो नहीं हैं? यह सवाल मेरे दिमाग में है तो गलत है। कोई भी स्तम्भ खतरे में नहीं है या आपको गलत कहने वाला में ही गलत हूँ। हम आपको गलत इसलिए कह रहे हैं लोकतंत्र के चार स्तम्भ में से सभी खतरे में नहीं हैं बल्कि सड़ चुके हैं। उन लोकतंत्र के चारो स्तम्भ से हम सभी को खतरा है बो किस दिन गिर जायेंगे ये कभी भी हो सकता है आपको लोकतंत्र के चार स्तम्भ में से सभी के सड़ने का प्रारूप बताता हूँ। 

            आपको भले ही इस लेख के कोई मायने पसन्द आएं फिर भी अपने विचार रखना सभी का अधिकार है जो हमें संबिधान ने दिया है मीडिया ने तभी तक अच्छा कार्य किया जबतक आम लोगों को यह पता नहीं था अपनी बात रखने का अधिकार सभी को है जैसे - जैसे लोगों को यह पता चलता जा रहा है अपनी बात कहने का अधिकार सभी है  

        इस चक्कर में सोसल मीडिया में लोग अपने चैनल बना कर अपनी बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल कर रहे हैं चैनल के माध्यम से बेफिजूल की बातें फैलाना शुरू हो गया है सरकार या प्रशासन उस चैनल पर कोई कारवाही करता है तो अन्य सोसल मीडिया चैनल अभिव्यक्ति की आजादी का हनन बताते हैं राजनितिक बिपक्षी दल लोकतंत्र की हत्या बताते हैं सोसल मीडिया साइट को ऑनर के साथ लिबरल गैंग के लोग भी सामिल हो जाते हैं

    लोगों की आदत धीरे- धीरे इस तरह की हो गयी है सरकार के खिलाफ आपकी आवाज जितनी बुलंद होगी बिपक्ष के लिए काम करने वाले उतने ही ज्यादा चैनल आपके साथ हो जायेंगे

       (1)- न्यायपालिका - न्यायपालिका के कार्य क्या हैं? ये तो आपने अपनी किताबों में खूब पढ़े होंगे थोड़ा सा हिस्सा कम शब्दों में लिख देता हूँ न्यायपालिका संप्रभुतासंपन्न राज्य की तरफ से सही निर्णय निकाल कर जो व्यक्ति भारतीय कानून ब्यवस्था या संबिधान का उलंघन करता है उसे दण्डित करने का काम न्यायपालिका करती है। न्यायपालिका न्याय करती कैसे है? ज्यादातर जिसके पास पावर है उसके गलत होने पर भी न्याय उसके पक्ष में ही जाता है

      (2)- कार्यपालिका - कार्यपालिका कुछ अंग हैं जो सायद अभी सड़े नहीं है। कुछ हिस्सा सड़ने के बाद भी मजबूती है कार्यपालिका के मुख्य अंग (i) राष्ट्रपति (ii) उप राष्ट्रपति (iii) मंत्री परिषद इन सभी अंग या हिस्सों को चुनता कौन है बनाता कौन है ये जानकारी आप विकिपीडिया से ले सकते हैं अगर हम लिखेंगे तो लेख बड़ा हो जायेगा इन सभी अंगों में से आप खुद अंदाजा लगा लेना कौन सा हिस्सा सड़ चुका है

      (3) - विधायिका - राजनीत के बारे में में तो कुछ कहना ही नहीं है इस स्तम्भ ने तो खून ही निकाल लिया है लोकतंत्र का. फिर भी आपको विधायिका के कार्यों के बारे में थोड़ा संकेत लिख देता हूँ विधायिका  या विधानमंडल एक ही है जो राजनीत दलों की इकाई से अपने अपने क्षेत्रों के द्वारा चुन कर आते हैं। विधानसभा मंडल को अपने राज्य में किसी कानून को हटाने जन नीतियों को बदलने का अधिकार होता है। अन्य देशों की विधायिका एक सदनीय भी होती है। पर भारत के संबिधान में दो सदनीय विधायिका है। विधायिका को राज्य की लोकसभा भी कहा जाता है

       (4)- मीडिया - इस लेख की मुख्य रूप रेखा मीडिया के लिए ही है। लोग जिसे लोकतंत्र के बाकी तीन स्तम्भ का आईना समझ बैठे हैं बो आईना अब अजेंडा चलाने लगा है। यह लोकतंत्र चौथा स्तम्भ सबसे बाद में सड़ना आरम्भ हुआ और सबसे पहले सड़ चुका है मीडिया एक तरफ और बाकी के तीन स्तम्भ एक तरफ,दोनों मिलकर  लोकतंत्र का शोषण कर रहे हैं जिन्हें आवाम की आवाज के लिए हमने मुखिया के तौर पर देखा है बो पत्रकार अब बिक चुका है पत्रकार अब वही खबर निकालता है जिसके उसे पैसे मिलते हैं पत्रकार को खबर निकालने के लिए भी पैसे दिए जाते हैं जो बड़ा पत्रकार है न्यूज़ चैनल पर बैठकर ख़बरें दिखाता है उसे किस हिसाब से दिखाना चाहिए ये पहले से तय किया जाता है

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        न्यूज चैनल या अखवार खबर को किस तरह आप तक पहुंचाएगा आपके दिमाग में डर का माहौल बना देगा, पत्रकार किसी के खिलाफ आपको खड़ा कर देगा पत्रकार किसी गलत इंसान को बचाने की लड़ाई भी लड़ लेगा पत्रकार हर बो काम कर देगा जो उसे नहीं करना चाहिए दुनियां के पत्रकार चाहे जो करते हों लेकिन भारतीय पत्रकार की वर्तमान हालात आपको बताते हैं जो बिल्कुल सच है आपको सायद आज लगे अगर कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा तो आपको मेरे जैसा महसूस होने लगेगा मीडिया, पत्रकार जो लोकतंत्र की आवाज है लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है बो दो तरह से काम कर रहा है

       मेरे इस तरह के लेख से सायद भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश की छवि खराब हो रही है ऐसा आपके मन में खयाल गया हो हम ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं इस तरह का प्रोपोगेंडा जो फैलाते बो किसी के इसारों पर होता है कार्यपालिका और न्यायपालिका अभी भी अपने कर्म पर टिकी हैं विधायिका जो राजनीत का हिस्सा है वह सदन के बाहर जो घमासान मचाती है वह हिस्सा खराब है बाकी विधानसभा और लोकसभा के अंदर हंगामें के बाद निर्णय होता है वह लोकतंत्र के हित में ही होता है

      (1) रिपोर्टर - रिपोर्टर वह होता है जो दूर दराज के इलाकों से ख़बरें न्यूज़ चैनल पर दिखाने के लिए या अखवार में छापने के लिए लाता है समाज में क्या सही और गलत हो रहा है उसकी खोज करता है गलत को गलत सही को सही बताने का प्रयास करता है पर हमारे भारत में इसका उलट शुरू हो गया है

 

      Reporter Identity Card बना दिया जाता है जो 500 रूपये देकर आप भी बनवा सकते हो जिस चैनल के लिए रजिस्ट्रेशन करोगे आपके पत्रकार पहचान पत्र (patrakar identity card) में उस चैनल का लोगो होगा Reporter Identity Card 500 रूपये में एक वर्ष के लिए वैध रहेगा उसके बाद 300 रूपये में पुनः Reporter Identity Card 300 रूपये रिनेवल करवा सकते हैं पत्रकार वाले पहचान पत्र से आपको फायदा क्या क्या रहेगा? पत्रकार बनकर बहुत फायदे हैं लेकिन उसके पहले आपके Reporter Identity Card होना आवश्यक है

 

      आप बेरोजगार हैं आपके पास Reporter Identity Card है वह पत्रकार का पहचान पत्र दिखा कर जो राशन कार्ड धारकों को सस्ता ग़ल्ला देता है उसे दिखा सकते हैं उस पत्रकारिता वाले पहचान पत्र का आपको फायदा यह होगा राशन डीलर जितना भी घोटाला करता है उसमें से आपको पांच सौ रूपये प्रतिमाह देगा उस पांच सौ रूपये की वजह से आप उस राशन डीलर के घोटाले की खबर नहीं निकालेंगे जिससे प्रशासन को पता चल सके। आपको ऐसे ही एक नहीं कमसे कम दस या उससे अधिक लोग खोजने हैं जो आपको प्रतिमाह 500 रूपये खबर निकालने के दे सकें

       आपको Reporter Identity Card गले में डालकर निकल जाना है जिस सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार हो रहा है उसके सामने खड़ा होना है आप कोई भी भ्रस्टाचार की खबर चैनल तक पहुँचाओ इसलिए कुछ रूपये देगा आपको पत्रकार होने की तनख्वाह चैनल की तरफ से तो कुछ मिलती नहीं है उसके बाद भी आप 10 हजार से अधिक प्रतिमाह कमा सकते हैं इसलिए मेरा मानना तो यही है अगर आप बेरोजगार हैं Reporter Identity Card) बनवा लो

         (2) संपादक - न्यूज़ चैनल या अखवार का संपादक जिस पर पूरी जिम्मेदारी होती है लोगों तक गंभीर खबर को भी कितनी आसानी से पहुँचाया जा सके जिससे लोग गंभीर हों। साथ में उसके पास यह दिशा निर्देशन की जिम्मेदारी भी होती है लोगों के बीच खबर का असर किस तरह से होगा खबर का परिणाम क्या होगा?

        पर आज ये सब उलट हो रहा है। जो खबर गंभीर नहीं है उसे गंभीर बना कर लोगों तक न्यूज़ एंकर के द्वारा या अखवार के द्वारा पहुँचायी जाती है जो विषय सच में गंभीर है बो दबा हुआ है सायद न्यूज़ चैनल के हिसाब से बो खबर ही रद्दी है

           (3) - न्यूज़ एंकर -सबसे बड़ा रोल प्ले न्यूज़ एंकर का है जो संपादक भी होता है न्यूज़ चैनल के संपादक जो अजेंडा चला रहे हैं उस पर काम न्यूज़ एंकर बखूबी कर रहे हैं हिन्दू मुस्लिम होते देख न्यूज़ चैनल की स्थिति ऐसी हो गयी है कुछ न्यूज़ चैनल मुस्लिम व्यक्ति को अपराधी होते हुए भी उसका बचाव करता है कुछ चैनल की स्थिती ऐसी है हिन्दू के अपराधी होने पर उसे बचाया जाता है

         न्यूज़ एजेंसिया सिर्फ पैसे के लिए काम करने लगीं है क्या खबर देश को दिखानी चाहिए क्या नहीं दिखानी चाहिए ये सब तय होता है तय होने के बाद भी अगर किसी अन्य पार्टी ने पैसा अधिक दे दिया दिया तो खबर दिखाने वाली भी दिखा दी जाती है

 

          पत्रकार अपनी न्यूज़ में अक्सर कहता है की यह पूरे समाज की लड़ाई है या अखवार अपनी किसी लाइन में लिख देता है ये समाज को नीचा दिखाने की साजिस है में आपको बता दूँ ये समाज की लड़ाई लड़ना पत्रकारों ने बंद कर दिया है। इनकी आपस की लड़ाई है कुछ पत्रकार मुस्लिम धर्म के ठेकेदारों का अजेंडा चला रहे हैं कुछ पत्रकार ठेकदारों का अजेंडा चला रहे हैं किस बात को न्यूज़ चैनल में उछालना है किसे दबाना है ये सब ठेकेदार तय करते हैं

 

        आपके दिमाग में अगर अभी भी यह सवाल है कि लोकतंत्र के चार स्तम्भ में से कौन सा खतरे में है? ये सवाल मेरे हिसाब से गलत है। कोई स्तम्भ खतरे में नहीं है। बल्कि हमें इन चारो में से जो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है उससे सबसे अधिक खतरा है  क्योंकि यह स्तम्भ सड़ चुके हैं इन चारो स्तम्भ पर भारत का लोकतंत्र टिका है सड़े हुए स्तम्भ पर कोई बिल्डिंग टिकी कैसे है? कब तक टिकी रहेगी? और अगर ऐसे ही अगर टिकी रहेगी तो लोकतंत्र में रहने वालों को चिंता होनी चाहिए हम सड़े हुए खम्बो पर टिके मकान में रह रहे हैं



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